रक्षाबंधन 2025: राखी बांधने का शुभ मुहूर्त हर साल की तरह, साल 2025 में भी रक्षाबंधन का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा. यह भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है. इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों की हर परिस्थिति में रक्षा करने का वचन देते हैं. रक्षाबंधन 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त साल 2025 में रक्षाबंधन 8 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा. राखी बांधने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है, क्योंकि शुभ समय में किया गया कोई भी कार्य अधिक फलदायी माना जाता है. * पूर्णिमा तिथि का आरंभ: 7 अगस्त 2025, शाम 4 बजकर 17 मिनट से * पूर्णिमा तिथि की समाप्ति: 8 अगस्त 2025, शाम 6 बजकर 39 मिनट पर राखी बांधने का सबसे अच्छा समय प्रदोष काल माना जाता है, जब भद्रा नहीं होती. साल 2025 में 8 अगस्त को भद्रा का साया नहीं है, इसलिए बहनें पूरे दिन बिना किसी चिंता के अपने भाई को राखी बांध सकती हैं. राखी बांधने का सही तरीका राखी बांधने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि यह पर्व और भी शुभ हो: * सबसे पहले पूजा की थाली तैयार करें, जिसमें रोली, अक्षत (चावल), दीपक, मिठाई और राखी रखें. * भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं. * भाई के माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाएं. * इसके बाद, दाहिने हाथ की कलाई पर राखी बांधें. * राखी बांधने के बाद भाई को मिठाई खिलाएं और उनकी आरती उतारें. * अंत में, भाई-बहन एक-दूसरे का आशीर्वाद लें. यह लेख आपकी जानकारी के लिए है. इस पावन पर्व को अपने परिवार के साथ मिलकर मनाएं और भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते को और भी मजबूत करें.

 रक्षाबंधन 2025: राखी बांधने का शुभ मुहूर्त

हर साल की तरह, साल 2025 में भी रक्षाबंधन का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा. यह भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है. इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों की हर परिस्थिति में रक्षा करने का वचन देते हैं.

रक्षाबंधन 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त

साल 2025 में रक्षाबंधन 8 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा. राखी बांधने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है, क्योंकि शुभ समय में किया गया कोई भी कार्य अधिक फलदायी माना जाता है.

 * पूर्णिमा तिथि का आरंभ: 7 अगस्त 2025, शाम 4 बजकर 17 मिनट से

 * पूर्णिमा तिथि की समाप्ति: 8 अगस्त 2025, शाम 6 बजकर 39 मिनट पर

राखी बांधने का सबसे अच्छा समय प्रदोष काल माना जाता है, जब भद्रा नहीं होती. साल 2025 में 8 अगस्त को भद्रा का साया नहीं है, इसलिए बहनें पूरे दिन बिना किसी चिंता के अपने भाई को राखी बांध सकती हैं.

राखी बांधने का सही तरीका

राखी बांधने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि यह पर्व और भी शुभ हो:

 * सबसे पहले पूजा की थाली तैयार करें, जिसमें रोली, अक्षत (चावल), दीपक, मिठाई और राखी रखें.

 * भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं.

 * भाई के माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाएं.

 * इसके बाद, दाहिने हाथ की कलाई पर राखी बांधें.

 * राखी बांधने के बाद भाई को मिठाई खिलाएं और उनकी आरती उतारें.

 * अंत में, भाई-बहन एक-दूसरे का आशीर्वाद लें.

यह लेख आपकी जानकारी के लिए है. इस पावन पर्व को अपने परिवार के साथ मिलकर मनाएं और भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते को और भी मजबूत करें.


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बागी बलिया का गौरवशाली इतिहास: विद्रोह, त्याग और बलिदान की गाथा बलिया... एक ऐसा नाम जो सुनते ही हर भारतीय के मन में साहस, स्वाभिमान और क्रांति की एक अमिट तस्वीर उभर आती है। यह सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि एक पहचान है – एक ऐसी पहचान जिसने इसे "बागी बलिया" का गौरवपूर्ण विशेषण दिया। गंगा और घाघरा (सरयू) जैसी पवित्र नदियों के संगम पर स्थित यह भूमि सदियों से ऋषि-मुनियों की तपस्थली और क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत रही है। इसका इतिहास सिर्फ विद्रोह का नहीं, बल्कि ज्ञान, अध्यात्म और संस्कृति का भी है। आइए, बलिया के गौरवशाली इतिहास को विस्तार से जानते हैं, जिसके पन्ने त्याग और बलिदान की कहानियों से भरे हुए हैं। प्राचीन काल: ऋषियों की भूमि बलिया का इतिहास इतना पुराना है कि यह पौराणिक कथाओं और वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इस पवित्र भूमि पर कई महान ऋषियों ने तपस्या की। * भृगु मुनि: बलिया का नाम सबसे प्रमुख रूप से महर्षि भृगु से जुड़ा है। उन्होंने इसी भूमि पर अपना आश्रम स्थापित किया था, जो आज भी भृगु मुनि मंदिर के रूप में मौजूद है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने भगवान विष्णु की 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में यहाँ विभिन्न समुदायों का आगमन हुआ, जिससे यहाँ की संस्कृति और सामाजिक ताना-बाना और भी समृद्ध हुआ। ब्रिटिश शासन और 'बागी बलिया' का उदय बलिया के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी अध्याय ब्रिटिश राज के दौरान लिखा गया। जहाँ पूरे देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी, वहीं बलिया में यह आंदोलन एक अलग ही रूप ले चुका था। यहाँ के लोगों में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक गहरा रोष था, जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक हर कदम पर दिखाई दिया। यह कहानी सिर्फ एक घटना की नहीं, बल्कि एक मिट्टी के स्वाभिमान की है। यहाँ के किसानों और युवाओं ने हमेशा ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों, खासकर भू-राजस्व व्यवस्था (Land Revenue System) का खुलकर विरोध किया। 1942: जब बलिया ने खुद को आजाद घोषित किया आजादी की लड़ाई में बलिया का नाम हमेशा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) से जुड़ा रहेगा। महात्मा गांधी ने जब "करो या मरो" का नारा दिया, तो पूरे देश में क्रांति की लहर दौड़ गई, लेकिन बलिया में इस आंदोलन ने एक अभूतपूर्व रूप ले लिया। * विद्रोह की शुरुआत: 9 अगस्त 1942 को गांधीजी समेत सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। बलिया में भी छात्रों और युवाओं ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। * मांगों का दबाव: स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। उन्होंने सरकारी दफ्तरों, थानों और जेलों पर कब्जा करने की योजना बनाई। उनकी मुख्य मांग थी कि बलिया के सभी राजनैतिक कैदियों को तुरंत रिहा किया जाए। * 19 अगस्त 1942 की ऐतिहासिक घटना: 19 अगस्त को, बलिया के जिला कारागार के बाहर 50,000 से अधिक लोगों की भीड़ जमा हो गई। उन्होंने जेल का गेट तोड़कर सभी कैदियों को रिहा कर दिया। इस घटना ने ब्रिटिश अधिकारियों को हिला दिया। * समानांतर सरकार की स्थापना: इस विद्रोह का नेतृत्व कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता चित्तू पांडे ने किया। जनता के भारी दबाव और विद्रोह को देखते हुए, तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर जे. सी. निक्सन को झुकना पड़ा और उसने चित्तू पांडे को बलिया का नया जिलाधिकारी (Magistrate) घोषित कर दिया। इसी के साथ, बलिया ने खुद को आजाद घोषित कर दिया और एक समानांतर सरकार (Parallel Government) की स्थापना की गई। * मात्र 13 दिनों की आजादी: बलिया ने लगभग 13 दिनों तक ब्रिटिश राज से मुक्त रहकर अपनी खुद की सरकार चलाई। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अनूठी और अद्भुत घटना थी। * अंग्रेजों का दमन: हालाँकि, यह स्वतंत्रता बहुत कम समय के लिए ही रही। 13 दिनों बाद ब्रिटिश सेना ने भारी संख्या में बलिया पर हमला किया। इस हमले में कई निर्दोष लोग मारे गए और समानांतर सरकार को कुचल दिया गया। चित्तू पांडे और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर भयानक अत्याचार किए गए। लेकिन इस घटना ने बलिया को "बागी" होने का सम्मान दिला दिया। आजादी के बाद का बलिया 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद भी बलिया का योगदान जारी रहा। यहाँ की मिट्टी ने कई महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया, जिन्होंने देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण काम किए। * मंगल पांडे: हालाँकि, सिपाही मंगल पांडे का जन्म बलिया से सटे नगवा गांव (बलिया और गाजीपुर की सीमा पर) में हुआ था, लेकिन उनके क्रांतिकारी चरित्र को अक्सर बागी बलिया की भावना से जोड़ा जाता है। * जयप्रकाश नारायण: लोकनायक जयप्रकाश नारायण, जिन्होंने 1970 के दशक में संपूर्ण क्रांति का नारा दिया, उनका जन्म भी बलिया के सिताबदियारा गांव में हुआ था। उन्होंने देश की राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। * साहित्य और कला: बलिया की धरती ने कई लेखकों, कवियों और कलाकारों को भी जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी रचनाओं से भोजपुरी और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। आज बलिया अपनी उपजाऊ भूमि, मेहनती किसानों और गंगा-सरयू की गोद में बसी संस्कृति के लिए जाना जाता है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान वही है जो इसने आजादी की लड़ाई में अर्जित की थी – "बागी बलिया"। यह नाम सिर्फ विद्रोह का प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, बलिदान और स्वाभिमान की एक ऐसी विरासत है, जो यहाँ की हर पीढ़ी को गर्व से जीने की प्रेरणा देती है।

CONGRATULATIONS TO VC UPENDRA SINGH

15 August ko ध्वजा रोहड़ FLAG HOSTING AND 26 JAN KO FLAG UNFURLING झंडा फहराना कहा जाता है