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15 August ko ध्वजा रोहड़ FLAG HOSTING AND 26 JAN KO FLAG UNFURLING झंडा फहराना कहा जाता है

 Bk sir  15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) और 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) दोनों ही भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण दिन हैं, लेकिन इन दोनों दिनों में झंडा फहराने का तरीका और इससे जुड़ी परंपराएं अलग-अलग होती हैं। 15 अगस्त: ध्वजारोहण (Flag Hoisting) 15 अगस्त को ध्वजारोहण होता है। 1947 में जब भारत को आजादी मिली थी, तो उस समय ब्रिटिश झंडे को नीचे उतारकर भारत का तिरंगा ऊपर चढ़ाया गया था। इसी ऐतिहासिक घटना की याद में, हर साल 15 अगस्त को झंडे को रस्सी से खींचकर नीचे से ऊपर ले जाया जाता है और फिर उसे फहराया जाता है।  * Bk sir कौन फहराता है: इस दिन प्रधानमंत्री ध्वजारोहण करते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्वतंत्रता के समय भारत में राष्ट्रपति का पद नहीं था, और प्रधानमंत्री सरकार के प्रमुख के रूप में देश का नेतृत्व करते थे।  * जगह: यह समारोह नई दिल्ली के लाल किले पर होता है। 26 जनवरी: झंडा फहराना (Flag Unfurling) 26 जनवरी को झंडा फहराया जाता है। इस दिन हमारा संविधान लागू हुआ था और भारत एक गणराज्य बना था। इस प्रक्रिया में, झंडा पहले से ही पोल के ऊपर बंधा होता है और राष्ट्रपति सिर्फ रस्सी खींच...

बागी बलिया का गौरवशाली इतिहास: विद्रोह, त्याग और बलिदान की गाथा बलिया... एक ऐसा नाम जो सुनते ही हर भारतीय के मन में साहस, स्वाभिमान और क्रांति की एक अमिट तस्वीर उभर आती है। यह सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि एक पहचान है – एक ऐसी पहचान जिसने इसे "बागी बलिया" का गौरवपूर्ण विशेषण दिया। गंगा और घाघरा (सरयू) जैसी पवित्र नदियों के संगम पर स्थित यह भूमि सदियों से ऋषि-मुनियों की तपस्थली और क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत रही है। इसका इतिहास सिर्फ विद्रोह का नहीं, बल्कि ज्ञान, अध्यात्म और संस्कृति का भी है। आइए, बलिया के गौरवशाली इतिहास को विस्तार से जानते हैं, जिसके पन्ने त्याग और बलिदान की कहानियों से भरे हुए हैं। प्राचीन काल: ऋषियों की भूमि बलिया का इतिहास इतना पुराना है कि यह पौराणिक कथाओं और वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इस पवित्र भूमि पर कई महान ऋषियों ने तपस्या की। * भृगु मुनि: बलिया का नाम सबसे प्रमुख रूप से महर्षि भृगु से जुड़ा है। उन्होंने इसी भूमि पर अपना आश्रम स्थापित किया था, जो आज भी भृगु मुनि मंदिर के रूप में मौजूद है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन्होंने भगवान विष्णु की छाती पर लात मारकर उनकी परीक्षा ली थी, जिससे उनकी सहिष्णुता और उदारता का पता चला। * वाल्मीकि और जमदग्नि: यह क्षेत्र रामायण काल से भी जुड़ा हुआ है। ऐसी मान्यता है कि महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी इसी के आस-पास था। इसके अलावा, ऋषि जमदग्नि की कर्मभूमि भी यही मानी जाती है। * ददरी मेला: बलिया का प्रसिद्ध ददरी मेला, जो भारत के सबसे बड़े पशु मेलों में से एक है, इसी प्राचीन विरासत का प्रतीक है। इसका नामकरण महान ददर मुनि के नाम पर हुआ था, जिनका आश्रम गंगा और सरयू के संगम पर था। इस तरह, बलिया ने प्राचीन काल से ही आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनने का गौरव प्राप्त किया। मध्यकालीन इतिहास: साम्राज्यों का हिस्सा मध्यकाल में बलिया बड़े-बड़े साम्राज्यों का हिस्सा रहा, लेकिन इसकी पहचान एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक या सैन्य केंद्र के रूप में नहीं बन पाई। यह दिल्ली सल्तनत और बाद में मुगल साम्राज्य के तहत आने वाले जौनपुर सल्तनत का हिस्सा था। इस दौरान यहाँ कई छोटे-बड़े रजवाड़े और जमींदारियां उभरीं। गंगा और सरयू नदियों के किनारे होने के कारण यह व्यापार और कृषि का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था। इस दौर में यहाँ विभिन्न समुदायों का आगमन हुआ, जिससे यहाँ की संस्कृति और सामाजिक ताना-बाना और भी समृद्ध हुआ। ब्रिटिश शासन और 'बागी बलिया' का उदय बलिया के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी अध्याय ब्रिटिश राज के दौरान लिखा गया। जहाँ पूरे देश में आजादी की लड़ाई चल रही थी, वहीं बलिया में यह आंदोलन एक अलग ही रूप ले चुका था। यहाँ के लोगों में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ एक गहरा रोष था, जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक हर कदम पर दिखाई दिया। यह कहानी सिर्फ एक घटना की नहीं, बल्कि एक मिट्टी के स्वाभिमान की है। यहाँ के किसानों और युवाओं ने हमेशा ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों, खासकर भू-राजस्व व्यवस्था (Land Revenue System) का खुलकर विरोध किया। 1942: जब बलिया ने खुद को आजाद घोषित किया आजादी की लड़ाई में बलिया का नाम हमेशा 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) से जुड़ा रहेगा। महात्मा गांधी ने जब "करो या मरो" का नारा दिया, तो पूरे देश में क्रांति की लहर दौड़ गई, लेकिन बलिया में इस आंदोलन ने एक अभूतपूर्व रूप ले लिया। * विद्रोह की शुरुआत: 9 अगस्त 1942 को गांधीजी समेत सभी बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। बलिया में भी छात्रों और युवाओं ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। * मांगों का दबाव: स्थानीय नेताओं के नेतृत्व में हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। उन्होंने सरकारी दफ्तरों, थानों और जेलों पर कब्जा करने की योजना बनाई। उनकी मुख्य मांग थी कि बलिया के सभी राजनैतिक कैदियों को तुरंत रिहा किया जाए। * 19 अगस्त 1942 की ऐतिहासिक घटना: 19 अगस्त को, बलिया के जिला कारागार के बाहर 50,000 से अधिक लोगों की भीड़ जमा हो गई। उन्होंने जेल का गेट तोड़कर सभी कैदियों को रिहा कर दिया। इस घटना ने ब्रिटिश अधिकारियों को हिला दिया। * समानांतर सरकार की स्थापना: इस विद्रोह का नेतृत्व कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता चित्तू पांडे ने किया। जनता के भारी दबाव और विद्रोह को देखते हुए, तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर जे. सी. निक्सन को झुकना पड़ा और उसने चित्तू पांडे को बलिया का नया जिलाधिकारी (Magistrate) घोषित कर दिया। इसी के साथ, बलिया ने खुद को आजाद घोषित कर दिया और एक समानांतर सरकार (Parallel Government) की स्थापना की गई। * मात्र 13 दिनों की आजादी: बलिया ने लगभग 13 दिनों तक ब्रिटिश राज से मुक्त रहकर अपनी खुद की सरकार चलाई। यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक अनूठी और अद्भुत घटना थी। * अंग्रेजों का दमन: हालाँकि, यह स्वतंत्रता बहुत कम समय के लिए ही रही। 13 दिनों बाद ब्रिटिश सेना ने भारी संख्या में बलिया पर हमला किया। इस हमले में कई निर्दोष लोग मारे गए और समानांतर सरकार को कुचल दिया गया। चित्तू पांडे और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर भयानक अत्याचार किए गए। लेकिन इस घटना ने बलिया को "बागी" होने का सम्मान दिला दिया। आजादी के बाद का बलिया 1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद भी बलिया का योगदान जारी रहा। यहाँ की मिट्टी ने कई महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया, जिन्होंने देश और समाज के लिए महत्वपूर्ण काम किए। * मंगल पांडे: हालाँकि, सिपाही मंगल पांडे का जन्म बलिया से सटे नगवा गांव (बलिया और गाजीपुर की सीमा पर) में हुआ था, लेकिन उनके क्रांतिकारी चरित्र को अक्सर बागी बलिया की भावना से जोड़ा जाता है। * जयप्रकाश नारायण: लोकनायक जयप्रकाश नारायण, जिन्होंने 1970 के दशक में संपूर्ण क्रांति का नारा दिया, उनका जन्म भी बलिया के सिताबदियारा गांव में हुआ था। उन्होंने देश की राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव डाला। * साहित्य और कला: बलिया की धरती ने कई लेखकों, कवियों और कलाकारों को भी जन्म दिया है, जिन्होंने अपनी रचनाओं से भोजपुरी और हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। आज बलिया अपनी उपजाऊ भूमि, मेहनती किसानों और गंगा-सरयू की गोद में बसी संस्कृति के लिए जाना जाता है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान वही है जो इसने आजादी की लड़ाई में अर्जित की थी – "बागी बलिया"। यह नाम सिर्फ विद्रोह का प्रतीक नहीं, बल्कि साहस, बलिदान और स्वाभिमान की एक ऐसी विरासत है, जो यहाँ की हर पीढ़ी को गर्व से जीने की प्रेरणा देती है।

 बागी बलिया का गौरवशाली इतिहास: विद्रोह, त्याग और बलिदान की गाथा bk sir  बलिया... एक ऐसा नाम जो सुनते ही हर भारतीय के मन में साहस, स्वाभिमान और क्रांति की एक अमिट तस्वीर उभर आती है। यह सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि एक पहचान है – एक ऐसी पहचान जिसने इसे "बागी बलिया" का गौरवपूर्ण विशेषण दिया। गंगा और घाघरा (सरयू) जैसी पवित्र नदियों के संगम पर स्थित यह भूमि सदियों से ऋषि-मुनियों की तपस्थली और क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणास्रोत रही है। इसका इतिहास सिर्फ विद्रोह का नहीं, बल्कि ज्ञान, अध्यात्म और संस्कृति का भी है। आइए, बलिया के गौरवशाली इतिहास को विस्तार से जानते हैं, जिसके पन्ने त्याग और बलिदान की कहानियों से भरे हुए हैं। प्राचीन काल: ऋषियों की भूमि बलिया का इतिहास इतना पुराना है कि यह पौराणिक कथाओं और वैदिक काल से जुड़ा हुआ है। माना जाता है कि इस पवित्र भूमि पर कई महान ऋषियों ने तपस्या की।  * भृगु मुनि: बलिया का नाम सबसे प्रमुख रूप से महर्षि भृगु से जुड़ा है। उन्होंने इसी भूमि पर अपना आश्रम स्थापित किया था, जो आज भी भृगु मुनि मंदिर के रूप में मौजूद है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, उन...

रक्षाबंधन 2025: राखी बांधने का शुभ मुहूर्त हर साल की तरह, साल 2025 में भी रक्षाबंधन का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा. यह भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है. इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों की हर परिस्थिति में रक्षा करने का वचन देते हैं. रक्षाबंधन 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त साल 2025 में रक्षाबंधन 8 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा. राखी बांधने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है, क्योंकि शुभ समय में किया गया कोई भी कार्य अधिक फलदायी माना जाता है. * पूर्णिमा तिथि का आरंभ: 7 अगस्त 2025, शाम 4 बजकर 17 मिनट से * पूर्णिमा तिथि की समाप्ति: 8 अगस्त 2025, शाम 6 बजकर 39 मिनट पर राखी बांधने का सबसे अच्छा समय प्रदोष काल माना जाता है, जब भद्रा नहीं होती. साल 2025 में 8 अगस्त को भद्रा का साया नहीं है, इसलिए बहनें पूरे दिन बिना किसी चिंता के अपने भाई को राखी बांध सकती हैं. राखी बांधने का सही तरीका राखी बांधने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि यह पर्व और भी शुभ हो: * सबसे पहले पूजा की थाली तैयार करें, जिसमें रोली, अक्षत (चावल), दीपक, मिठाई और राखी रखें. * भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठाएं. * भाई के माथे पर रोली और अक्षत का तिलक लगाएं. * इसके बाद, दाहिने हाथ की कलाई पर राखी बांधें. * राखी बांधने के बाद भाई को मिठाई खिलाएं और उनकी आरती उतारें. * अंत में, भाई-बहन एक-दूसरे का आशीर्वाद लें. यह लेख आपकी जानकारी के लिए है. इस पावन पर्व को अपने परिवार के साथ मिलकर मनाएं और भाई-बहन के इस पवित्र रिश्ते को और भी मजबूत करें.

 रक्षाबंधन 2025: राखी बांधने का शुभ मुहूर्त हर साल की तरह, साल 2025 में भी रक्षाबंधन का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा. यह भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक है. इस दिन बहनें अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उनकी लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों की हर परिस्थिति में रक्षा करने का वचन देते हैं. रक्षाबंधन 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त साल 2025 में रक्षाबंधन 8 अगस्त, शुक्रवार को मनाया जाएगा. राखी बांधने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व होता है, क्योंकि शुभ समय में किया गया कोई भी कार्य अधिक फलदायी माना जाता है.  * पूर्णिमा तिथि का आरंभ: 7 अगस्त 2025, शाम 4 बजकर 17 मिनट से  * पूर्णिमा तिथि की समाप्ति: 8 अगस्त 2025, शाम 6 बजकर 39 मिनट पर राखी बांधने का सबसे अच्छा समय प्रदोष काल माना जाता है, जब भद्रा नहीं होती. साल 2025 में 8 अगस्त को भद्रा का साया नहीं है, इसलिए बहनें पूरे दिन बिना किसी चिंता के अपने भाई को राखी बांध सकती हैं. राखी बांधने का सही तरीका राखी बांधने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए ताकि यह पर्व और भी शुभ हो...

रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक है। इस त्योहार के पीछे कई पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो इसकी महत्ता को दर्शाती हैं। पौराणिक कथाएं * द्रौपदी और श्रीकृष्ण: महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लगी और खून बहने लगा, तो द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। श्रीकृष्ण ने इस स्नेह को एक रक्षा सूत्र के रूप में स्वीकार किया और द्रौपदी को हमेशा उसकी रक्षा करने का वचन दिया। बाद में, जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब श्रीकृष्ण ने उनके सम्मान की रक्षा करके अपना वचन निभाया। इसी घटना को रक्षाबंधन की शुरुआत माना जाता है। * इंद्र और इंद्राणी: भविष्य पुराण की एक कथा में देवताओं और दानवों के बीच युद्ध का वर्णन है। जब देवराज इंद्र युद्ध में हारने लगे, तो उनकी पत्नी शची (इंद्राणी) ने गुरु बृहस्पति के कहने पर इंद्र की कलाई पर एक रक्षा सूत्र बांधा। इस रक्षा सूत्र की शक्ति से इंद्र विजयी हुए। यह घटना भी रक्षाबंधन के महत्व को दर्शाती है। * यम और यमुना: एक अन्य कथा के अनुसार, यमराज (मृत्यु के देवता) की बहन यमुना ने उनकी कलाई पर राखी बांधी और उन्हें अमरता का आशीर्वाद दिया। यमराज ने अपनी बहन से वादा किया कि जो भी भाई इस दिन अपनी बहन से राखी बंधवाएगा, वह लंबी उम्र और सुख-समृद्धि पाएगा। * लक्ष्मी और राजा बलि: वामन अवतार की कथा से भी रक्षाबंधन का संबंध है। जब भगवान विष्णु ने वामन रूप में राजा बलि से तीन पग भूमि दान में लेकर उन्हें पाताल लोक भेज दिया, तो राजा बलि ने भगवान विष्णु से अपने साथ रहने का वचन मांगा। देवी लक्ष्मी ने अपने पति को वापस लाने के लिए राजा बलि को राखी बांधी और उन्हें अपना भाई बना लिया। बदले में, उन्होंने राजा बलि से उपहार के रूप में भगवान विष्णु को मांग लिया और उन्हें वैकुंठ वापस ले गईं। ऐतिहासिक कथा * रानी कर्णावती और हुमायूँ: मध्यकाल में, जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया, तो चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने मुगल सम्राट हुमायूँ को राखी भेजकर उनसे मदद मांगी। हुमायूँ ने इस राखी को स्वीकार किया और रानी की रक्षा के लिए अपनी सेना लेकर चित्तौड़ की ओर प्रस्थान किया। यह घटना भी भाई-बहन के रिश्ते में विश्वास और समर्थन का प्रतीक है, जो रक्षाबंधन के महत्व को दर्शाता है। इन कथाओं से यह स्पष्ट होता है कि रक्षाबंधन सिर्फ एक भाई-बहन का त्योहार नहीं है, बल्कि यह प्रेम, विश्वास, सम्मान और एक-दूसरे की रक्षा के वचन का भी प्रतीक है।

 रक्षाबंधन का त्योहार भाई-बहन के प्रेम और सुरक्षा का प्रतीक है। इस त्योहार के पीछे कई पौराणिक और ऐतिहासिक कथाएं जुड़ी हुई हैं, जो इसकी महत्ता को दर्शाती हैं। पौराणिक कथाएं  * द्रौपदी और श्रीकृष्ण: महाभारत की एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लगी और खून बहने लगा, तो द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। श्रीकृष्ण ने इस स्नेह को एक रक्षा सूत्र के रूप में स्वीकार किया और द्रौपदी को हमेशा उसकी रक्षा करने का वचन दिया। बाद में, जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था, तब श्रीकृष्ण ने उनके सम्मान की रक्षा करके अपना वचन निभाया। इसी घटना को रक्षाबंधन की शुरुआत माना जाता है।  * इंद्र और इंद्राणी: भविष्य पुराण की एक कथा में देवताओं और दानवों के बीच युद्ध का वर्णन है। जब देवराज इंद्र युद्ध में हारने लगे, तो उनकी पत्नी शची (इंद्राणी) ने गुरु बृहस्पति के कहने पर इंद्र की कलाई पर एक रक्षा सूत्र बांधा। इस रक्षा सूत्र की शक्ति से इंद्र विजयी हुए। यह घटना भी रक्षाबंधन के महत्व को दर्शाती है।  * यम और यमुना: एक अन्य कथा के अनुसार, ...

बादिलपुर, दुबेछपरा, मझौआ, बलिया के बाढ़ ग्रस्त इलाकों को कैसे बचाएं?

 बडिलपुर दुबेछपरा, बलिया, उत्तर प्रदेश में बाढ़ से बचाव के लिए कई तरीकों को अपनाया जा सकता है. इन तरीकों को दो मुख्य भागों में बांटा जा सकता है: दीर्घकालिक (लंबे समय के लिए) और अल्पकालिक (तुरंत किए जाने वाले उपाय). दीर्घकालिक उपाय (Long-term Measures) ये उपाय बाढ़ की समस्या को जड़ से खत्म करने या कम करने में मदद करते हैं.  * नदी तटबंधों को मजबूत करना: गंगा और घाघरा नदियों के किनारे कमजोर तटबंधों को मजबूत करना और जहाँ आवश्यक हो, नए तटबंधों का निर्माण करना बहुत ज़रूरी है. इन तटबंधों की नियमित मरम्मत और निगरानी भी आवश्यक है ताकि ये टूट न सकें.  * गाद निकालना (Dredging): नदियों की तलहटी में जमा होने वाली मिट्टी (गाद) को समय-समय पर निकालने से नदी की गहराई बढ़ती है और पानी ले जाने की क्षमता में सुधार होता है. इससे बाढ़ का खतरा कम होता है.  * जल निकासी प्रणाली में सुधार: गाँव के आसपास के नालों और जल निकासी चैनलों की सफाई और उन्हें गहरा करने से बाढ़ का पानी जल्दी निकल सकता है.  * बाढ़ प्रतिरोधी निर्माण: घरों को ऊँचे चबूतरे पर बनाना, और ऐसी सामग्री का उपयोग करना जो पानी ...

संवाददाता और पत्रकार में क्या अन्तर है?

 संवाददाता (रिपोर्टर) और पत्रकार (जर्नलिस्ट) के बीच कुछ बारीक अंतर होते हैं, लेकिन ये दोनों शब्द अक्सर एक-दूसरे के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। इसे आसान भाषा में ऐसे समझा जा सकता है: पत्रकार (Journalist) पत्रकार एक व्यापक शब्द है। यह उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो समाज के लिए महत्वपूर्ण घटनाओं, मुद्दों और जानकारियों को इकट्ठा करता है, उनका विश्लेषण करता है और उन्हें विभिन्न माध्यमों (जैसे, अखबार, पत्रिका, टीवी, रेडियो, या ऑनलाइन) से लोगों तक पहुँचाता है। एक पत्रकार का काम सिर्फ खबर लाना नहीं होता, बल्कि उसका विश्लेषण करना, उस पर राय देना और फीचर लेख लिखना भी होता है। एक पत्रकार, संपादक, स्तम्भकार (कॉलमिस्ट), या विशेष संवाददाता भी हो सकता है। यह एक तरह से पत्रकारिता के पूरे पेशे को दर्शाता है। संवाददाता (Reporter) संवाददाता या रिपोर्टर, पत्रकारिता का एक खास हिस्सा है। इसका मुख्य काम घटनाओं की जानकारी को सीधे घटना स्थल से इकट्ठा करके अपने समाचार संगठन तक पहुँचाना है। एक संवाददाता का काम तथ्यों पर आधारित होता है। वह किसी घटना की सटीक जानकारी, लोगों के बयान, और संबंधित विवरणों को जुटा...

I . Sc intermediate paas ka achha course

 12वीं बायो (PCB - Physics, Chemistry, Biology) से पास करने के बाद छात्रों के लिए करियर के कई बेहतरीन विकल्प मौजूद हैं. यह सिर्फ मेडिकल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े और भी कई क्षेत्र हैं जहाँ शानदार अवसर मिल सकते हैं. 1. मेडिकल और एलाइड हेल्थकेयर (Medical & Allied Healthcare) यह बायो स्टूडेंट्स के लिए सबसे लोकप्रिय विकल्प है, जिसमें शामिल हैं:  * MBBS (बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी): डॉक्टर बनने के लिए यह सबसे मुख्य कोर्स है. इसके लिए NEET (National Eligibility cum Entrance Test) क्वालीफाई करना ज़रूरी होता है.bk sir   * BDS (बैचलर ऑफ डेंटल सर्जरी): अगर दांतों और ओरल हेल्थ में रुचि है, तो यह 5 साल का कोर्स कर सकते हैं.  * BAMS (बैचलर ऑफ आयुर्वेदिक मेडिसिन एंड सर्जरी) / BHMS (बैचलर ऑफ होम्योपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी) / BUMS (बैचलर ऑफ यूनानी मेडिसिन एंड सर्जरी): अगर आप आयुष (आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) चिकित्सा प्रणाली में रुचि रखते हैं, तो ये कोर्स कर सकते हैं.  * B.Sc. Nursing (बैचलर ऑफ साइंस इन नर्सिंग...